Saturday, March 7, 2015

Triphala Churna (त्रिफला चूर्ण) Knowledge from Ayurveda in Hindi

त्रिफला चूर्ण
     नई बड़ी रसदार हरड़ (हरितिकी) फल, बहेड़ा (विभितिकी) और ताज़े आंवले को सामान भाग मिला कर पीस कर चूर्ण बनाना उत्तम होता है. पुराने हरड़ या पुराना रखा हुआ चूर्ण वांछित फल दायक नहीं माना जाता है. चूर्ण बनाने के लिए तीनो फलों की गुठली व छिलका निकाल देना चाहिये. पुराने रुके हुए मल को निकालने के लिये छोटी हरड़ वपाचन/दीपन के लिये बड़ी व पकी हुई हरड़ का प्रयोग करना चाहिये.
     त्रिफला चूर्ण अद्भुद गुणों से युक्त होता है. यह दीपन, रुचिकर, चक्षुष्य, रसायन, आयुस्थापक, वृष्य, सारक, हृद्य और ब्रिंहण होता है. त्रिफला चूर्ण प्रमेह, शोथ, कब्ज, शीतपित्त, विषमज्वर, रक्त विकार, वीर्य दोष, कफ़, पित्त और कुष्ठ रोगों में विशेष लाभदायक है.
 शाश्त्रों में भिन्न भिन्न रोगों के लिए निचे लिखे प्रयोग बताये हैं-
  1. रसायन गुण: पिप्पली, वंशलोचन और सहद के साथ.
  2. सामान्य ज्वर: पिप्पली व सहद के साथ.
  3. मेदरोग (Obescity or Fattening disease): सहद के साथ.
  4. उरुस्तम्भ: कुटकी के चूर्ण के साथ.
  5. नेत्र रोग: घी के साथ सेवन (दीर्घ काल तक) करने से मोतियाबिंद का बढ़ना रुक जाता है.
  6. शनैर्मेह or Dysuria:
    1. गिलोय के रस के साथ (slow or painful discharge of water from the bladder or passing urine slowly and painfully)
    2. अमलतास के गूदे और सहद के साथ (मूत्र में झाग की स्थिति में)
  7. प्रमेह(सभी प्रकार के) or diabetes, Gonorrhea etc.: हल्दी और मिश्री के साथ
  8. वृषणशोथ or Orchitis (inflammation of one or both of the testicles): गाय के मूत्र के साथ.
  9. भगन्दर or Fistula: खदिर की छाल के क्वाथ के साथ
  10. मूर्छा रोग: सहद के साथ
  11. पित्तज विद्रधि or Biliary Abscess: त्रिफला के क्वाथ में निसोत का चूर्ण मिलाकर और घी के साथ.